Saturday, February 8, 2014

सियासी सर्कस

चाहें चुनाव का नतीजा किसी के भी पक्ष में हो मगर सर एक बात तो है, आजकल सर्कस चल रहा है राजनीति का, जिसे देखो करतब दिखाने में लगा है, राहुल गांधी इमोशनल करके दर्शक रूपी जनता को रुलाने की कोशिश करते हैं तो नरेंद्र मोदी अपनी डायलागबाज़ी से दर्शकों को तालियां बजाने के लिए मजबूर कर देते हैं, तो कभी नीला हाथी और लोहिया साईकिल भी रिंग में आने पर दर्शकों का ध्यान आकर्शित करते हैं। लेकिन दर्शक इस सबसे कहां संतुष्ट होता है.. दर्शक तो फाईनल स्टंट के लिए अपना समय देता है... और फाइनल स्टंट तो बाज़ीगरी का हैं.. ऊपर लटकती रससी पर लटकना है, झूलना, कूदना है, करतब दिखाना है, मगर शर्त ये है कि नीचे सही सलामत आना है, तभी दर्शकों की सीटियां, तालियां और तारीफ मिलेगी। यानि साफ है कि जनता की नज़र में अगर चड़ना है तो ज़मीनी सतह से ऊपर उठकर कोई कमाल का करतब दिखाना होगा। अब ये बाज़ीगार कौन साबित होगा ये तो वक्त का सिपाही बतायेगा।..
                                       धन्यवाद. आदिल खान

Monday, January 27, 2014

मिट्टी का चूल्हा और सौंधी यादें




                                      एक फिक्र मेरी कलम से
वो चूल्हा याद आता है.. मिट्टी से बना वो चूल्हा हमारी तहज़ीब का हिस्सा हुआ करता था कभी।.. बावरचीखाने की ज़ीनत वो चूल्हा- कि जिसके इर्द गिर्द घेरा बनाकर बैठा करते थे हम सब सर्द मौसम में।.... कभी लकड़ी कभी कुछ झाड़ पत्तों से सुलगता वो चूल्हा.. गर्म सौंधी रोटियों का एक खज़ाना था।..कभी सोने से पहले उसी चूल्हे की गर्म राख में आलू दबाकर छोड़ देते थे.. कभी फुंकनी से बुझती आग को फिर से ज़ोर देते थे ... वो चूल्हा अब अजायब घरों की अमानत है, बहुत मायूस लगता है वो चूल्हा, बहुत गुमसुम सा रहता है, गैस चूल्हे ने उसकी रौनकों को फीका कर दिया है.. मगर रोटी का वो सौंधापन और गूंजते कैकहे बावरचीखाने के, उसी मिट्टी के चूल्हे की तरह नदारद हो चले हैं।.....

Thursday, January 23, 2014

BERAHAM HUKMARAA'N

कड़कड़ती ठंड का कहर, सर्द और गीली रातें, कोहरे में बनते ओझल होते अनजाने से साये.. ये हाल इस मौसम में लगभग पूरे उत्तर भारत का है... यही हाल राजस्थान के सीकर का भी है।... सीकर की हर गली मौहल्ले के दरों दीवार, सड़कें, चौराहे, घरों के दरवाज़े और महराबें सब ठंड से सीले हुए और सुन पड़े हुए हैं.. इस मौसम में कोई दरवाज़े पर आकर दस्तक भी देता है तो आवाज़ थोड़ी अलग सी निकलती है. ये ठंड का असर है।... बिजली के केबल भी तो ठंड से ऐठें पड़े हैं.. ये सब तो बेजान चीज़े हैं.. अब ज़रा उस इंसान को लेकर आप अपने दिमाग में एक खाका खीचिए जो ऐसी भीषण ठंड में खुले में रात गुज़ारने को मजबूर हैं.. ज़रा सोचिए उसकी तकलीफ के बारे में।.... उम्मीद है कि आपने सोच लिया होगा... लेकिन सीकर के स्थानीय प्रशासन को इस तरफ सोचने का न वक्त था और न ही प्रशासन के अंदर इंसानी एहसास का माददा बचा था... तभी तो ऐसी ठंड में कुछ लोगों के आशियाने उजाड़ कर बेघर कर दिया गया।... नाम अतिक्रमण हटाने का लगा मगर कोई पूछे तो जवाब मिल पायेगा क्या कि अगर ये आशियाने अवैध तरीके से बनाये भी गए थे तो कैसे इनमें बिजली और पानी के वैध कनैक्शन दे दिए गए... ज़ाहिर है इन विभागों के कर्मचारियों ने मजबूरी की हांडी में भ्रष्टाचार का मठ्ठा फेरा था।... इस बात से बिजली और पानी विभाग भी सज़ा के हकदार बन जाते हैं.. ये विभाग भी तो प्रशासन का हिस्सा हैं.. प्रशासन ने इनके लिए क्या सज़ा तजवीज़ की है।.... ये लोग तो सालों से यहां रह रहे थे... पहले क्यों नही हटाया.. अब क्यों।.. सरकार की योजना है.. सफाई करने की.. अतिक्रमण हटाने की।.. लोकसभा चुनाव के लिए जनता की बीच जाना है.. 60 दिनों के रोडमैप का झुंझुना हाथ में पकड़े... इसी के तहत अमीरों के घरों को जाने वाले रास्तों से गरीबों का अतिक्रमण हटाया जा रहा है।.. मगर ये 60 दिन का रोडमैप 90 दिन की एक बच्ची पर भारी पड़ गया। घर ज़मीदोज़ हो जाने के बाद ये परिवार भी खुले में रह रहा था.....इस परिवार में एक तीन महीने की बच्ची भी थी।...बच्चे अपनी मां की गोद में सबसे महफूज़ महसूस करते हैं.. लकिन मां की गोद की गर्माहट भी एक मासूम दुधमुंही बच्ची को बचा न सकी.. मां की गोद को इस बेरहम ठंड ने सुन्न भी कर दिया और सूना भी।... कुछ दिन और रुक जाता प्रशासन, कुछ दिन और तसल्ली कर लेता, कुछ दिन और सब्र का शरबत पी लेता.. कुछ ले देकर ही बात बना लेता तो क्या चला जाता।... कुछ नही जाता बल्कि बच जाता.. एक तीन महीने की बच्ची का जीवन.. 9 महीने तक तकलीफ सहने वाली एक मां की उम्मीदें... बच जाती कुछ किलकारियां.. नन्हें नन्हें पैरों की चहलकदमियां.... और बच जाता इंसान का ज़मीर भी जो उस बच्ची के साथ ही मर गया।... कुछ और बच्चे इस ठंड का शिकार हैं... खुले में जीने को मजबूर हैं दुआ है उन्हें कुछ न हो।..
        आदिल खान

Friday, January 17, 2014

सतरंगी सत्ता - अतरंगी हसरतें

सियासत एक ऐसा नशा है के जो इसकी गिरफ्त में आ जाए तो बस तौबा... इनसान पैर ज़मीन पर रखता है मगर ज़मीन पर चलना नहीं चाहता.. बुलंदियो के सिंहासन की चाहत होती ही कुछ ऐसी है.. कि फिर इन्सान भूल जाता कि उसकी शुरुआत कैसे हुई थी। दिल्ली के आसमान पर आम आदमी पार्टी के नाम का एक नया सूरज हज़ारो उम्मीदे लिये दमका तो लगा कि इसकी रौशनी पूरे भारत में फैल कर नई ऊर्जा का संचार करेगी.।. कांग्रेस के भ्रष्टाचार का अंधेरा दिल्ली से मिट चुका था.. और अरविंद केजरीवाल के जनता के हक में लिए गए ताबड़तोड़ फैसलों से उनकी पार्टी लुड़कते पारे के बीच देश भर में अपना दायरा बड़ाने लगी। लाखों की संख्या में लोग आम आदमी पार्टी के साथ जुड़ने लगे और ये सिलसिला अभी जारी है। लोगों को उम्मीद है कि आम आदमी पार्टी दूसरी पार्टियों से अलग है .. इसीलिए लोकसभा चुनाव में वो जीत दर्ज कर एक नये, उज्जवल, सुनहरे और भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण करेगी।. लेकिन राजनीति में कहां कुछ अलग होता है, कोई पार्टी अलग हो भी जाए तो उसके कार्यकर्ता क्या अलग हो सकते हैं। अगर हाल के हंगामों पर नज़र डाली जाए तो साफ हो जाएगा.. कि सर पर टोपी लगा लेने और गैर राजनीतिक लिबास पहन लेने से राजनीति की कैफियत और राजनितिक्षों की फितरत नहीं बदल जाती।.. यहां भी वही बवाल है जो कांग्रेस और और बीजेपी में हैं। निजी महत्तवकांक्षाओं पर यहां भी पार्टी की विचारधारा ताक पर रख दी जाती है।...नाराज़गी की सीलन बड़ती है तो नई दीवार में भी दरार नज़र आने लगती है।.. दिल्ली में आप के विधायक बिन्नी की लोकसभा का टिकट पाने की हसरत का गला घुटने के बाद कुछ ऐसी ही दरार नज़र आयी।...लेकिन हाल बीजेपी का भी अच्छा नहीं है । केजरीवाल की बोली मोदी को चुभ रही है और ऐसी चुभ रही है की छतों पर सलमान के साथ पहुंचना पड़ता है, पतंग उड़ाना पड़ता है । मोदी जानते हैं मंजिल को साधने का हुनर लेकिन मुश्किल ये हैं केजरीवाल को दरकिनार करके वो लालकिले की चौखट तक नहीं पहुंच सकते । बीजेपी उलझी हुई है लेकिन कांग्रेस भी कहां सुलझी है । लगा था प्रदेश के विधान सभा चुनाव में पटखनी खाने के बाद कांग्रेस सबक लेगी और संभलकर आम चुनाव के मैदान में उतरेगी।.. मगर ये क्या ..कांग्रेसी तो एक दूसरे पर ही पिल पड़े। मौका था भीलवाड़ा में कांग्रेस की हार की समीक्षा बैठक का.. मगर समीक्षा की जगह फ्री स्टाइल कुश्ती शुरू हो गई।.. मुक्के, झापड़, लातें पटखी जिसे जो पैतरा आता था आज़मा लिया।.. रिंग में दोनों टीमों के कैपटन भी मौजूद थे.. एक- कांग्रेस के पूर्व मंत्री रामलाल जाट और दूसरे कांग्रेस नेता अक्षय त्रिपाठी। फिलहाल जो कुछ कांग्रेस में हो रहा है उससे तो बीजेपी और आप को फायदा ही है... क्योंकि दुश्मन की फौज आपस में ही भिड़ जाए इससे अच्छा सामने खड़ी फौज के लिए कुछ नही होता।..