कड़कड़ती ठंड का कहर, सर्द और गीली रातें, कोहरे में बनते ओझल होते अनजाने से साये.. ये हाल इस मौसम में लगभग पूरे उत्तर भारत का है... यही हाल राजस्थान के सीकर का भी है।... सीकर की हर गली मौहल्ले के दरों दीवार, सड़कें, चौराहे, घरों के दरवाज़े और महराबें सब ठंड से सीले हुए और सुन पड़े हुए हैं.. इस मौसम में कोई दरवाज़े पर आकर दस्तक भी देता है तो आवाज़ थोड़ी अलग सी निकलती है. ये ठंड का असर है।... बिजली के केबल भी तो ठंड से ऐठें पड़े हैं.. ये सब तो बेजान चीज़े हैं.. अब ज़रा उस इंसान को लेकर आप अपने दिमाग में एक खाका खीचिए जो ऐसी भीषण ठंड में खुले में रात गुज़ारने को मजबूर हैं.. ज़रा सोचिए उसकी तकलीफ के बारे में।.... उम्मीद है कि आपने सोच लिया होगा... लेकिन सीकर के स्थानीय प्रशासन को इस तरफ सोचने का न वक्त था और न ही प्रशासन के अंदर इंसानी एहसास का माददा बचा था... तभी तो ऐसी ठंड में कुछ लोगों के आशियाने उजाड़ कर बेघर कर दिया गया।... नाम अतिक्रमण हटाने का लगा मगर कोई पूछे तो जवाब मिल पायेगा क्या कि अगर ये आशियाने अवैध तरीके से बनाये भी गए थे तो कैसे इनमें बिजली और पानी के वैध कनैक्शन दे दिए गए... ज़ाहिर है इन विभागों के कर्मचारियों ने मजबूरी की हांडी में भ्रष्टाचार का मठ्ठा फेरा था।... इस बात से बिजली और पानी विभाग भी सज़ा के हकदार बन जाते हैं.. ये विभाग भी तो प्रशासन का हिस्सा हैं.. प्रशासन ने इनके लिए क्या सज़ा तजवीज़ की है।.... ये लोग तो सालों से यहां रह रहे थे... पहले क्यों नही हटाया.. अब क्यों।.. सरकार की योजना है.. सफाई करने की.. अतिक्रमण हटाने की।.. लोकसभा चुनाव के लिए जनता की बीच जाना है.. 60 दिनों के रोडमैप का झुंझुना हाथ में पकड़े... इसी के तहत अमीरों के घरों को जाने वाले रास्तों से गरीबों का अतिक्रमण हटाया जा रहा है।.. मगर ये 60 दिन का रोडमैप 90 दिन की एक बच्ची पर भारी पड़ गया। घर ज़मीदोज़ हो जाने के बाद ये परिवार भी खुले में रह रहा था.....इस परिवार में एक तीन महीने की बच्ची भी थी।...बच्चे अपनी मां की गोद में सबसे महफूज़ महसूस करते हैं.. लकिन मां की गोद की गर्माहट भी एक मासूम दुधमुंही बच्ची को बचा न सकी.. मां की गोद को इस बेरहम ठंड ने सुन्न भी कर दिया और सूना भी।... कुछ दिन और रुक जाता प्रशासन, कुछ दिन और तसल्ली कर लेता, कुछ दिन और सब्र का शरबत पी लेता.. कुछ ले देकर ही बात बना लेता तो क्या चला जाता।... कुछ नही जाता बल्कि बच जाता.. एक तीन महीने की बच्ची का जीवन.. 9 महीने तक तकलीफ सहने वाली एक मां की उम्मीदें... बच जाती कुछ किलकारियां.. नन्हें नन्हें पैरों की चहलकदमियां.... और बच जाता इंसान का ज़मीर भी जो उस बच्ची के साथ ही मर गया।... कुछ और बच्चे इस ठंड का शिकार हैं... खुले में जीने को मजबूर हैं दुआ है उन्हें कुछ न हो।..
आदिल खान
आदिल खान
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