एक फिक्र मेरी कलम से
वो चूल्हा याद आता है.. मिट्टी से बना वो चूल्हा हमारी तहज़ीब का हिस्सा हुआ करता था कभी।.. बावरचीखाने की ज़ीनत वो चूल्हा- कि जिसके इर्द गिर्द घेरा बनाकर बैठा करते थे हम सब सर्द मौसम में।.... कभी लकड़ी कभी कुछ झाड़ पत्तों से सुलगता वो चूल्हा.. गर्म सौंधी रोटियों का एक खज़ाना था।..कभी सोने से पहले उसी चूल्हे की गर्म राख में आलू दबाकर छोड़ देते थे.. कभी फुंकनी से बुझती आग को फिर से ज़ोर देते थे ।... वो चूल्हा अब अजायब घरों की अमानत है, बहुत मायूस लगता है वो चूल्हा, बहुत गुमसुम सा रहता है, गैस चूल्हे ने उसकी रौनकों को फीका कर दिया है.. मगर रोटी का वो सौंधापन और गूंजते कैकहे बावरचीखाने के, उसी मिट्टी के चूल्हे की तरह नदारद हो चले हैं।.....
वो चूल्हा याद आता है.. मिट्टी से बना वो चूल्हा हमारी तहज़ीब का हिस्सा हुआ करता था कभी।.. बावरचीखाने की ज़ीनत वो चूल्हा- कि जिसके इर्द गिर्द घेरा बनाकर बैठा करते थे हम सब सर्द मौसम में।.... कभी लकड़ी कभी कुछ झाड़ पत्तों से सुलगता वो चूल्हा.. गर्म सौंधी रोटियों का एक खज़ाना था।..कभी सोने से पहले उसी चूल्हे की गर्म राख में आलू दबाकर छोड़ देते थे.. कभी फुंकनी से बुझती आग को फिर से ज़ोर देते थे ।... वो चूल्हा अब अजायब घरों की अमानत है, बहुत मायूस लगता है वो चूल्हा, बहुत गुमसुम सा रहता है, गैस चूल्हे ने उसकी रौनकों को फीका कर दिया है.. मगर रोटी का वो सौंधापन और गूंजते कैकहे बावरचीखाने के, उसी मिट्टी के चूल्हे की तरह नदारद हो चले हैं।.....

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