Monday, February 10, 2014

दिल्ली एक शहर - एक इंकलाब (मेरी कलम से)

              दिल्ली एक शहर - एक इंकलाब (मेरी कलम से)

दिल्ली उम्मीदों से भरा एक ज़िन्दा दिल शहर... इसकी मिट्टी से उठने वाली खुशबू में ही ज़िन्दादिली है।... ये शहर रात के वक्त भी जागता है.. सुबह को दौड़ लगाता है, दोपहर को शिफ्ट चेंज करता है, शाम को किसी चाय के स्टॉल पर गप्पे लड़ाता है, और रात से पहले टीवी के सामने आसन जमा लेता है, ये शहर ऐसा ही है, बिज़ी बिज़ी सा.. झुंझलाता, मुस्कुराता, मगर लगातार चलता जाता- ये शहर ऐसा ही है।... ये रौनकें हमेशा से ही इस शहर की तहज़ीब का हिस्सा रही हैं, पहले तुर्क और फिर मुग़लो को भी दिल्ली से मोहब्बत हुई, उसी मोहब्बत का सबूत कुतुब मीनार, हुमांयू का मकबरा, जामा मस्जिद और लाल किले की शक्ल में आज भी हमारी आंखों के सामने नुमाया है।..
 हज़रत निज़ामुद्दीन जैसे औलिया ने दिल्ली को अपनी दुआओं से नवाज़ा तो मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे बेजोड़ शायर की गज़लो ने.. पुरानी दिल्ली की तंग गलियों से लेकर बहादुर शाह ज़फर के दीवाने खास तक मौजूद तमाम दिलों को धड़कने पर मजबूर कर दिया।...इस शहर ने कश्मीरी गेट को टूटते देखा, ज़फर को कैद होकर रंगून जाते देखा, लुटियन दिल्ली को बनते देखा, आज़ादी के परवानो को फिरंगी हुकुमत के आतिशदानों में जलते देखा।.. इसी शहर ने फिर इंकलाब देखा, आज़ाद हिंदुस्तान की खुशबू को महसूस किया और लाल किले पर संयुक्त भारत का पहला झंडा लहराते देखा ।.. आज़ाद भारत एक लोकतांत्रिक देश, जिसका अर्थ है कि जहां कोई राजा न हो बल्कि प्रजा खुद अपना नुमाईंदा चुनकर देश की संसद में भेजे.. ताकि उसकी ज़रूरतों और परेशानियों की आवाज़ बुलंद हो सके।.. 
लेकिन आज़ादी के इन 66 सालों में हुआ क्या, जनता की आवाज़ उठने के बाजाए हमने संसद में चिल्ला पुकारी सुनी, आरोप प्रत्यारोप सुनें, नोट उछलते देखे, लालछन लगते देखे और झड़पें होती देखीं... जनता की फरियाद, ज़रूरते और हक तो मानों इस शोर शराबे में कही दब से गए,, ऐसा लगता है जैसे संसद सत्तापक्ष और विपक्ष की भभौती हो।.. इन रहनुमाओं को तो हम ही ने चुनकर भेजा था तो फिर गलती कहाँ हुई, कमी कहाँ रही, क्या हमारे चयन में कमी थी, या फिर ये नेता ही कमियों की फैक्ट्री का प्रोडक्ट हैं, या फिर ये दिल्ली की सदियों पुरानी उस हवा के नशे का असर है जिसमें मदहोश होकर हुकमरान आवाम को नज़रअंदाज़ करते आये हैं।.. इस शहर ने तुर्क, मुगल, राजा, महाराजा, अंग्रेज़ो, अगैरा वगैरा सबके तख्त डगमगाते देखे हैं, इस शहर ने कई इंकलाब देखें हैं... ये शहर फिर से एक नया इंकलाब देख रहा है, ये इंकलाब कितना कारगर साबित होगा ये वक्त नहीं- दिल्ली बताएगी।...  

                                  
                                 आदिल खान..............

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