रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला में तरह तरह के रसायनों के मिश्रण से
उठते बुलबुले... चटखती- भभकती टेस्ट ट्यूब, तरह तरह की गैसों की उठती खुशबू.. इस
बात की तस्दीक के लिए काफी हुआ करती थी..कि प्रयोगशाला में प्रोफेसर साहब छात्रों
को कोई नया फॉर्मूला बनाने की तरकीब सिखा रहे हैं।... लेकिन वक्त बदल चुका है..
फॉर्मूले अब सिर्फ रसायन विज्ञान की भभौती नही... अब तो राजनीतिक पार्टियां भी
फॉर्मूला ईजाद करने की बड़ी प्रयोगशालाएं बन चुकी हैं.. और इन प्रयोगशालाओं में
कम्पटीशन चल रहा है साहब.. कम्पटीशन रोज़ नये नये और दूसरों से बहतर फॉर्मूले लाने
का।.. अब बीजेपी भी अपनी प्रयोगशाला से राजस्थान में एक
नया फॉर्मूला लेकर आई है........ फार्मूला ये है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में
टिकट बंटवारा.. पार्टी के कार्यकर्ताओं.. सबंधित लोकसभा क्षेत्र के पार्टी
पदाधिकारियों.. और मौजूदा व पूर्व विधायकों से रायशुमारी के बाद लिया जायेगा।..बीजेपी
के लिए इस फॉर्मूले को ईजाद करने वाले साइंटिस्ट का नाम है कप्तान सिंह सोलंकी..
इसी लिए इस फार्मूले को सोलंकी फार्मूला भी कहा जा रहा है।.. कप्तान सिंह सोलंकी
बीजेपी प्रदेश प्रभारी हैं.. लिहाज़ा अपने कंधे पर रखी जिम्मेदारियों की तलवार की
धार का अंदाज़ा उन्हें बखूबी है... वो जानते हैं कि लोकसभा चुनाव में पार्टी की
बहतर परफामेंस ही ये तय करेगी.. कि विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिली प्रचंड जीत
कोई तुक्का नही थी।.. लेहाज़ा बहुत सध कर चलना हैं.. सबको साथ लेकर चलना हैं..
क्योंकि ज़रा सा भी विरोध पार्टी की फज़ीहत का बाइस बन सकता है... और फज़ीहत फायदा
नही..हमेशा नुकसान देती है।. इसीलिए लोकसभा सीटों के टिकट बटवारे के लिए रायशुमीरी
का फॉर्मूला लेकर आये हैं साइंटिस्ट सोलंकी।..ऐसा नही है कि ऐसे फॉर्मूले पहली बार
मार्किट में आये हैं... इससे पहले भी कई और राजनीतिक दलों के जोशीले साइंटिस्ट..
राजनीतिक व्यवस्थाओं को बदलने की नियत से फॉर्मूले ला चुके हैं।.. कांग्रेस के
उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी 2013 विधानसभा चुनाव से पहले कुछ फॉर्मूले लाये थे... जिनकी
चुनाव से पहले ही हवा निकल गई.. बावजूद इसके राहुल बाबा ने लोकसभा चुनाव में
संशोधित फॉर्मूला दिया है.. जिसका नाम है प्रीपोल फॉर्मूला ।...लेकिन राजनैतिक
फॉर्मूलों की बात करें तो इसके जनक अरविंद केजरीवाल माने जाते हैं.. दिल्ली की
सत्ता पर काबिज़ होकर केजरीवाल अपने फॉर्मूले का पेटेंट करा चुके हैं... यानि बाद
के सारे फॉर्मूले ओरिजनल नहीं बल्कि “आप” की पाईरेटिड कॉपी नज़र आती हैं।...खैर.. दावे और तर्क सबके अपने अपने
हैं... राहुल गांधी के पिछले फॉर्मूले कांग्रेस की दशा और दिशा को सुधार नही
सके... अरविंद केजरीवाल अपने फॉर्मूलों का पेटेंट पहले ही करा चुके हैं.... और अब
बीजेपी चुनावी समर में कूदने के लिए एक फॉर्मूला लाई है।.... बहरहाल ...अपने
फॉर्मूले को कामयाब फॉर्मूला बताने के लिए कोई कुछ भी बोले.. कोई कितने भी दावे कर
ले...लेकिन लोकतंत्र में तो फॉर्मूला वही हिट है जो सत्ता का स्वाद चखाये।...
आदिल खान