Saturday, February 22, 2014

राजनीति के फॉर्मूले

रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला में तरह तरह के रसायनों के मिश्रण से उठते बुलबुले... चटखती- भभकती टेस्ट ट्यूब, तरह तरह की गैसों की उठती खुशबू.. इस बात की तस्दीक के लिए काफी हुआ करती थी..कि प्रयोगशाला में प्रोफेसर साहब छात्रों को कोई नया फॉर्मूला बनाने की तरकीब सिखा रहे हैं।... लेकिन वक्त बदल चुका है.. फॉर्मूले अब सिर्फ रसायन विज्ञान की भभौती नही... अब तो राजनीतिक पार्टियां भी फॉर्मूला ईजाद करने की बड़ी प्रयोगशालाएं बन चुकी हैं.. और इन प्रयोगशालाओं में कम्पटीशन चल रहा है साहब.. कम्पटीशन रोज़ नये नये और दूसरों से बहतर फॉर्मूले लाने का।.. अब बीजेपी भी अपनी प्रयोगशाला से राजस्थान में एक नया फॉर्मूला लेकर आई है........ फार्मूला ये है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में टिकट बंटवारा.. पार्टी के कार्यकर्ताओं.. सबंधित लोकसभा क्षेत्र के पार्टी पदाधिकारियों.. और मौजूदा व पूर्व विधायकों से रायशुमारी के बाद लिया जायेगा।..बीजेपी के लिए इस फॉर्मूले को ईजाद करने वाले साइंटिस्ट का नाम है कप्तान सिंह सोलंकी.. इसी लिए इस फार्मूले को सोलंकी फार्मूला भी कहा जा रहा है।.. कप्तान सिंह सोलंकी बीजेपी प्रदेश प्रभारी हैं.. लिहाज़ा अपने कंधे पर रखी जिम्मेदारियों की तलवार की धार का अंदाज़ा उन्हें बखूबी है... वो जानते हैं कि लोकसभा चुनाव में पार्टी की बहतर परफामेंस ही ये तय करेगी.. कि विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिली प्रचंड जीत कोई तुक्का नही थी।.. लेहाज़ा बहुत सध कर चलना हैं.. सबको साथ लेकर चलना हैं.. क्योंकि ज़रा सा भी विरोध पार्टी की फज़ीहत का बाइस बन सकता है... और फज़ीहत फायदा नही..हमेशा नुकसान देती है।. इसीलिए लोकसभा सीटों के टिकट बटवारे के लिए रायशुमीरी का फॉर्मूला लेकर आये हैं साइंटिस्ट सोलंकी।..ऐसा नही है कि ऐसे फॉर्मूले पहली बार मार्किट में आये हैं... इससे पहले भी कई और राजनीतिक दलों के जोशीले साइंटिस्ट.. राजनीतिक व्यवस्थाओं को बदलने की नियत से फॉर्मूले ला चुके हैं।.. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी 2013 विधानसभा चुनाव से पहले कुछ फॉर्मूले लाये थे... जिनकी चुनाव से पहले ही हवा निकल गई.. बावजूद इसके राहुल बाबा ने लोकसभा चुनाव में संशोधित फॉर्मूला दिया है.. जिसका नाम है प्रीपोल फॉर्मूला ।...लेकिन राजनैतिक फॉर्मूलों की बात करें तो इसके जनक अरविंद केजरीवाल माने जाते हैं.. दिल्ली की सत्ता पर काबिज़ होकर केजरीवाल अपने फॉर्मूले का पेटेंट करा चुके हैं... यानि बाद के सारे फॉर्मूले ओरिजनल नहीं बल्कि आप की पाईरेटिड कॉपी नज़र आती हैं।...खैर.. दावे और तर्क सबके अपने अपने हैं... राहुल गांधी के पिछले फॉर्मूले कांग्रेस की दशा और दिशा को सुधार नही सके... अरविंद केजरीवाल अपने फॉर्मूलों का पेटेंट पहले ही करा चुके हैं.... और अब बीजेपी चुनावी समर में कूदने के लिए एक फॉर्मूला लाई है।.... बहरहाल ...अपने फॉर्मूले को कामयाब फॉर्मूला बताने के लिए कोई कुछ भी बोले.. कोई कितने भी दावे कर ले...लेकिन लोकतंत्र में तो फॉर्मूला वही हिट है जो सत्ता का स्वाद चखाये।... 

                                                        आदिल खान 

Sunday, February 16, 2014

वंशवाद और दंशवाद दोनों तरह की राजनीतिक नाटक मंडलियों के प्राइम कैरक्टरों की आखों में केजरीवाल नाम का कुरकुरा सुरमा बुरी तरह से खटक रहा है।... 

Monday, February 10, 2014

दिल्ली एक शहर - एक इंकलाब (मेरी कलम से)

              दिल्ली एक शहर - एक इंकलाब (मेरी कलम से)

दिल्ली उम्मीदों से भरा एक ज़िन्दा दिल शहर... इसकी मिट्टी से उठने वाली खुशबू में ही ज़िन्दादिली है।... ये शहर रात के वक्त भी जागता है.. सुबह को दौड़ लगाता है, दोपहर को शिफ्ट चेंज करता है, शाम को किसी चाय के स्टॉल पर गप्पे लड़ाता है, और रात से पहले टीवी के सामने आसन जमा लेता है, ये शहर ऐसा ही है, बिज़ी बिज़ी सा.. झुंझलाता, मुस्कुराता, मगर लगातार चलता जाता- ये शहर ऐसा ही है।... ये रौनकें हमेशा से ही इस शहर की तहज़ीब का हिस्सा रही हैं, पहले तुर्क और फिर मुग़लो को भी दिल्ली से मोहब्बत हुई, उसी मोहब्बत का सबूत कुतुब मीनार, हुमांयू का मकबरा, जामा मस्जिद और लाल किले की शक्ल में आज भी हमारी आंखों के सामने नुमाया है।..
 हज़रत निज़ामुद्दीन जैसे औलिया ने दिल्ली को अपनी दुआओं से नवाज़ा तो मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे बेजोड़ शायर की गज़लो ने.. पुरानी दिल्ली की तंग गलियों से लेकर बहादुर शाह ज़फर के दीवाने खास तक मौजूद तमाम दिलों को धड़कने पर मजबूर कर दिया।...इस शहर ने कश्मीरी गेट को टूटते देखा, ज़फर को कैद होकर रंगून जाते देखा, लुटियन दिल्ली को बनते देखा, आज़ादी के परवानो को फिरंगी हुकुमत के आतिशदानों में जलते देखा।.. इसी शहर ने फिर इंकलाब देखा, आज़ाद हिंदुस्तान की खुशबू को महसूस किया और लाल किले पर संयुक्त भारत का पहला झंडा लहराते देखा ।.. आज़ाद भारत एक लोकतांत्रिक देश, जिसका अर्थ है कि जहां कोई राजा न हो बल्कि प्रजा खुद अपना नुमाईंदा चुनकर देश की संसद में भेजे.. ताकि उसकी ज़रूरतों और परेशानियों की आवाज़ बुलंद हो सके।.. 
लेकिन आज़ादी के इन 66 सालों में हुआ क्या, जनता की आवाज़ उठने के बाजाए हमने संसद में चिल्ला पुकारी सुनी, आरोप प्रत्यारोप सुनें, नोट उछलते देखे, लालछन लगते देखे और झड़पें होती देखीं... जनता की फरियाद, ज़रूरते और हक तो मानों इस शोर शराबे में कही दब से गए,, ऐसा लगता है जैसे संसद सत्तापक्ष और विपक्ष की भभौती हो।.. इन रहनुमाओं को तो हम ही ने चुनकर भेजा था तो फिर गलती कहाँ हुई, कमी कहाँ रही, क्या हमारे चयन में कमी थी, या फिर ये नेता ही कमियों की फैक्ट्री का प्रोडक्ट हैं, या फिर ये दिल्ली की सदियों पुरानी उस हवा के नशे का असर है जिसमें मदहोश होकर हुकमरान आवाम को नज़रअंदाज़ करते आये हैं।.. इस शहर ने तुर्क, मुगल, राजा, महाराजा, अंग्रेज़ो, अगैरा वगैरा सबके तख्त डगमगाते देखे हैं, इस शहर ने कई इंकलाब देखें हैं... ये शहर फिर से एक नया इंकलाब देख रहा है, ये इंकलाब कितना कारगर साबित होगा ये वक्त नहीं- दिल्ली बताएगी।...  

                                  
                                 आदिल खान..............

Saturday, February 8, 2014

सियासी सर्कस

चाहें चुनाव का नतीजा किसी के भी पक्ष में हो मगर सर एक बात तो है, आजकल सर्कस चल रहा है राजनीति का, जिसे देखो करतब दिखाने में लगा है, राहुल गांधी इमोशनल करके दर्शक रूपी जनता को रुलाने की कोशिश करते हैं तो नरेंद्र मोदी अपनी डायलागबाज़ी से दर्शकों को तालियां बजाने के लिए मजबूर कर देते हैं, तो कभी नीला हाथी और लोहिया साईकिल भी रिंग में आने पर दर्शकों का ध्यान आकर्शित करते हैं। लेकिन दर्शक इस सबसे कहां संतुष्ट होता है.. दर्शक तो फाईनल स्टंट के लिए अपना समय देता है... और फाइनल स्टंट तो बाज़ीगरी का हैं.. ऊपर लटकती रससी पर लटकना है, झूलना, कूदना है, करतब दिखाना है, मगर शर्त ये है कि नीचे सही सलामत आना है, तभी दर्शकों की सीटियां, तालियां और तारीफ मिलेगी। यानि साफ है कि जनता की नज़र में अगर चड़ना है तो ज़मीनी सतह से ऊपर उठकर कोई कमाल का करतब दिखाना होगा। अब ये बाज़ीगार कौन साबित होगा ये तो वक्त का सिपाही बतायेगा।..
                                       धन्यवाद. आदिल खान