Saturday, April 12, 2014

मुसलमान और सियासत

मुसलमान हैं या धार्मिक उत्सव का लंगर.. कोई बांटना चाहता है.. कोई लूटना चाहता है.. कोई लुटवाने में मदद करता है।.. चक्कर क्या है.... ये चुनाव आते ही, कोई पुराने ज़ख्म कुरेद कर हमदर्दी के वोटों की संभावनाएं तलाशने लगता है.... कोई ये कह कर चूल्हे पर पक रही चाय की तरह मुसलमानों को उबालने की कोशिश करता है कि... उनको आबादी के हिसाब से इस मुल्क में उनका हक़ नहीं मिला।.. कोई आरक्षण का ख्वाब दिखा कर ग़ायब हो जाता है... कोई मुसलमानों की हालत जानने के लिए कमेटी गठित कर देता है... और अब तो मार्केट में एक नया वादा आया है... कल तक मदरसों को आतंकियों की ट्रेनिंग का अड्डा मानने वाले कह रहे हैं .. कि मदरसों का आधुनिकीकरण करेंगे।... कमाल है... सियासत है या चुनावी चकल्लस.. कुछ भी बोल कर तालियां बटोर लो बस।.... असल में गलती इन सबकी नहीं है... गलती खुद उस कौम की है.. जो उम्मीदों का गांजा पीकर 5 साल तक खुमारी की नींद सोती है।... जब हम उधार देकर याद रखते हैं तो फिर वोट देकर क्यों भूल जाते हैं... सवाल करना सीख ले कोई, तो दिलासों और झूठे वादों की मंडी में अकाल पड़ जाता है हुज़ूर।..... मुसलमानों की हालत के ज़िम्मेदार मुसलमान खुद हैं.. यकीन न हो तो सिर्फ दिल्ली का रुख कीजिए.. लाल किला जाकर 10 रुपये का टिकट लीजिए.. और म्यूज़ियम में रखे ताज, तलवारों और लिबासों में अपने पुरखों का इतिहास टटोल लीजिए... एहसास हो जायेगा आपके अंदर क्या कमी है।.... अगर बात समझ आ जाये तो ठीक... और ना समझ आये तो इतना और समझ लीजिएगा... कि इस बार फिर कोई बहन जी, कोई नेता जी, कोई शहज़ादे, कोई साहेबज़ादे, कोई पितामाह, कोई मौलाना, कोई दीदी, कोई दीदा, कोई नदीदा, कोई चाचा और कोई भतीजा आपको उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा कर ले जायेगा।।..

आदिल खान....

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